श्रीमद्भागवत परमात्मा श्रीकृष्ण का वाङ्मय स्वरूप है। यह संस्कृत साहित्य का परमोत्कृष्ट रत्न तथा सभी दार्शनिक मतभेदों का समन्वय करनेवाला महान् ग्रंथ है। भगवान् के मधुरतम प्रेम रस का लहराता हुआ सागर है। जिस धर्म में कोई कपट न हो, ऐसा धर्म भागवत का मुख्य विषय है।
रामचरितमानस की भाँति श्रीमद्भागवत भी जन-जन तक पहुँच सके तो समाज प्रेमसूत्र में गुँथकर हिंसा, क्लेश, वैर-विरोध, ईर्ष्या-असूया, कामना-क्रोध जैसे दुर्गुणों से बच सकता है। स्वतंत्र भारत में भवन निर्माण तो हुए, पर मानव निर्माण नहीं हो सका। जनसंख्या तो बढ़ी, किंतु नैतिकता धराशायी होती चली गई। शेषशायी की कथाओं से दूर तरुणाई ‘सेजशायी’ लौकिक व्यक्तियों से प्रभावित होने लगी है। ऐसे कठिन समय में श्रीमती मनु हरिदत्त पाठक ने श्रीमद्भागवत को आधार बनाकर जो कथाएँ लिखी हैं वे अत्यंत जनोपयोगी होंगी।
कथा में साधारण समाज का मन भी लगता है। कथा से संस्कार-परिवर्तन की प्रक्रिया प्रारंभ होती है। श्री मनुबेन का परिश्रम सराहनीय है।
अधिकाधिक परिवारों तक यह ग्रंथ पहुँचे और देश पुनः अपने उज्ज्वल अतीत की श्रेष्ठता को वर्तमान की धरा पर स्थापित करने में समर्थ हो, ऐसी मेरी सर्वसमर्थ प्रभु श्रीकृष्ण से प्रार्थना है।
—स्वामी सत्यमित्रानंद गिरि
(निवृत्त जगद्गुरु शंकराचार्य, ज्योतिर्मठ शाखा)
संस्थापक : भारत माता मंदिर, हरिद्वार